Amazing benefit of grapes in hindi | अंगूर के चौंका देने वाले फायदे | Benefit of grapes juice

Amazing benefit of grapes in hindi | अंगूर के चौंका देने वाले फायदे

अंगूर के चौंका देने वाले फायदे
अंगूर के चौंका देने वाले फायदे


Benefit of grapes juice

अंगूर का रस भी बड़ा सुपाच्य, पौष्टिक व बलवर्धक माना गया है। इसमें शर्करा होती है, पर यह डायबिटीज (मधुमेह) के रोगी को कोई हानि नहीं देता है। यह बहुत ही मुलायम फल माना गया है। मुंह में डालते ही घुल जाता है। अंगूर में पोटाशियम 52.99, सोडियम 3.98, कैल्शियम 6.91, मैग्नीशियम 3.29, लोहा 1.19, फोसफोरिक एसिड 21.20, सल्फ्यूरिक एसिड 5.00, सैलसिलिक एसिड 6.57 तथा क्लोरीन 1.82 होता है।
अंगूर की जन्मभूमि काकेशिया तथा उसके सीमान्त प्रदेश बतलायी गयी है, पर कुछ लोगों का विश्वास है कि सर्वप्रथम अंगूर को रूस के आरमीनिया प्रान्त में उगाया गया था। उसके बाद यह शीतोष्ण कटिबन्ध के क्षेत्रों-दक्षिणी यूरोप, पश्चिमी एशिया, कोस्को तथा अल्जीरिया आदि देशों में फैला और अब आस्ट्रेलिया, अमेरिका, दक्षिणी अफ्रीका, ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान तथा भारत आदि संसार के कई देशों में सफलतापूर्वक उगाया जा रहा है।
भारत में यह प्रायः समस्त शीत प्रधान स्थानों में पैदा होता है, किन्तु कश्मीर, कुमाऊ, देहरादून, हिमाचल से समीपवर्ती प्रदेशों तथा नासिक, पूना, औरंगाबाद, दौलताबाद आदि दक्षिण के प्रान्तों में बहुतायत से पाया जाता है, पर सीमांत प्रदेशों, खासकर अफगानिस्तान और ईरान के अंगूर काफ़ी मीठे और गुणकारी माने गये हैं। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार विश्व में लगभग चार हज़ार किस्मों के अंगूर मिलते हैं। यह आकार, रंग और स्वाद की दृष्टि से भिन्न-भिन्न प्रकार के हैं।

चमन का अंगूर सबसे मीठा होता है

चमन का अंगूर सबसे मीठा होता है और क्वेटा का खट्टा। पकने पर स्वाद में अन्तर आ जाता है। कलमक, हेदा तथा हुसैनी आदि अंगूर के मुख्य भेद हैं। भारत में अंगूर की अमेरिकन, यूरोपियन तथा आस्ट्रेलियन आदि कई किस्में भी पैदा की जाने लगी हैं। रंग की दृष्टि से काले और हरे दो प्रकार के अंगूर मुख्य रूप से पाये जाते हैं। काले रंग वाले अंगूर आकार में बड़े तथा हरे रंग के अंगूर छोटे होते हैं।
बड़े आकार वाले अंगूरों में बीज भी होते हैं, जिनके सुखाने पर मुनक्का बनता है। हरे रंग का छोटा अंगूर सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। पकावट की दृष्टि से भी अंगूर के गुण भिन्न-भिन्न होते हैं। जो पूरे पके हए अंगूर होते हैं, वे गुण में उत्तम होते हैं और रोगी को अधिक लाभ होता है। प्राय: कच्चे अंगूर ही पेटी में बन्द कर दूर-दूर स्थानों पर भेज दिये जाते हैं। जहां वे पूरे पक नहीं पाते। कृत्रिम तरीकों से पकाने पर उनका प्राकृतिक स्वाद और गुण कम हो जाता है।
कच्चे अंगूर से क़ब्ज़ दूर होती है, शरीर पुष्ट होता है, स्वर उत्तम बनता है और वीर्य वृद्धि होती है। भोजन में रुचि बढ़ती है। अम्ल प्रधान होते हुए भी अंगूर का शरीर में प्रभाव आरोग्य दायक होता । अंगूर के रस से चीनी भी बनायी जाती है। अंगूर से जो चीनी बनती है, वह अत्यधिक गुणकारी होती है। आधुनिक चिकित्सक अंगूर से बने ग्लूकोज को ही रोगी को उपचार में देना पसन्द करते हैं। अंगूर कुछ महंगा होता है। इसके द्वारा प्राप्त की गयी शर्करा महंगी ही होती है, फिर गुणकारी होने के कारण इसका अपना ही महत्त्व है। अंगूर में ग्लूकोज पर्याप्त मात्रा में रहता है। अंगूर में यह विशिष्ट शर्करा ग्यारह से पचास प्रतिशत तक पायी जाती है। अंगूर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पचा-पचाया भोजन है, जो सेवन से थोड़ी देर पश्चात् ही सेवन करने वाले के शरीर में ऊर्जा, स्फूर्ति और शक्ति प्रदान करता है।

शरीर की दृष्टि से निर्बल रोगि |

जिन्हें साधारण चीनी हानिकारक बतायी गयी हो, उन्हें ग्लूकोज का प्रयोग करना चाहिए। शरीर की दृष्टि से निर्बल रोगियों और बच्चों को भी ग्लूकोज का इस्तेमाल करना ठीक है। इससे नेत्रों की ज्योति बढ़ती है, शरीर पुष्ट होता है, वीर्य की वृद्धि होती है, अरुचि का नाश होकर भूख बढ़ती है। सौ ग्राम अंगूर सेवन करने से लगभग 45 कैलोरी ऊर्जा मिलती है। अंगूर में जल तथा पोटाशियम की भी समुचित मात्रा होती है।कुछ मात्रा में ऐल्बूमेन तथा सोडियम क्लोराइड भी होता है। अंगूर में प्राय: सभी जीवन तत्त्व मौजूद हैं, जिनसे मनुष्य के शरीर की पुष्टि होती है।
अंगूर की खुराक पर रहकर भी मनुष्य अपना जीवन-निर्वाह कर सकता है। वैसे पका अंगूर कुछ दस्तावर, शीतल, नेत्रों के लिए हितकारी, पुष्टिकारक, रस व पाक में मधुर, स्वर शोधक, रक्तशोधक, वीर्यवर्द्धक तथा शरीर में पाये जाने वाले विजातीय द्रव्यों को बाहर फेंकने वाला माना गया है।

मिरगी के रोगियों के लिए अंगूर का रस

मिरगी के रोगियों के लिए अंगूर का रस लाभदायक है। इसके 125 ग्राम की मात्रा में सेवन करने से मिरगी का प्रभाव मिट जाता है। अंगूर का रस 1/2 कप सूर्योदय से पूर्व पान कर लेने पर आधाशीशी का दर्द (सिर का दर्द) मिट जाता है। अंगूर खाने के बाद पानी नहीं पीना चाहिए। कफ, सर्दी, खांसी हो, तो अंगूर का रस पीने से आराम मिलता है। दमा के रोग में भी अंगूर लाभदायक है। हृदय में दर्द हो और तेजी से धड़कने के कारण दिल घबराता हो, तो अंगूर का रस पीने से शान्ति मिलती है।

यह घबराहट को दूर करता है।

अंगूर मनुष्य के स्वास्थ्य, शक्ति, स्फूर्ति, यौवन बनाये रखने वाला उपयोगी फल है। जिनका स्वास्थ्य ठीक है, उन्हें भी उसे बनाये रखने के लिए प्रतिदिन 125 ग्राम अंगूर का रस पीना चाहिए। जैसे-जैसे रस का प्रभाव पड़ेगा, उसका प्रभाव पूरे शरीर और विशेषत: पाचन-संस्थान पर स्पष्ट नजर आने लगा। गालों पर सहज स्वाभाविक लालिमा दिखाई देने लगेगी। स्मरण शक्ति बढ़ जायेगी और काम करने में मन लगने लगेगा। द्राक्षासव और द्राक्षारिष्ट नामक दो चमत्कारी दवाइयां अंगूर के रस से ही तैयार की जाती हैं। अंगूर का रस आंतों तथा गुर्दो की शक्ति की वृद्धि करता है। जिन्हें भूख कम लगती हो, उन्हें अंगूर-जैसे पौष्टिक रस का प्रचुर मात्रा में उपयोग करना चाहिए। क़ब्ज़ को दूर करने में यह अत्यन्त उपयोगी है तथा यकृत विकारों को दूर करता है, अतिसार को मिटाता है। रक्त-पित्त के रोगियों के लिए, जिन्हें नाक, मुख अथवा मूत्र मार्गों से रक्त जाता है, उन्हें थोड़ी-थोड़ी मात्रा में अंगूर का सेवन करना चाहिए।

हृदय की पीड़ा को यह दूर कर देता है।

हृदय की पीड़ा को यह दूर कर देता है। सभी प्रकार के फलों की तुलना में अंगूर के भीतर ग्लूकोज अधिक रहता है। इसे ग्लूकोज द्राक्षाश कहते हैं। अंगूर में किसी प्रकार का श्वेतसार नहीं होता है। इसे प्रतिदिन ग्रहण करने से बहुत से रोगों से मुक्ति मिलती है। अंगूर में साधारणत: शक्कर का अंश रहता है, पर अंगूर सूखकर जब किशमिश बन जाता है, तब इसकी शर्करा करीब आठ गुना बढ़ जाती है। इसलिए शक्कर की दृष्टि से किशमिश अंगूर से कहीं ज्यादा पुष्टिकर है।
किशमिश के भीतर जो शक्कर रहती है, वह दूसरी श्रेणी के शक्करों से श्रेष्ठ है। इसका अधिकांश भाग ही ग्लूकोज तथा फल-शक्कर है। किशमिश (सूखा अंगूर) मुख्य रक्तवर्द्धक खाद्य है। साधारण खाद्यों में जिस परिमाण का लोहा रहता है, उससे कई गुना अधिक लोहा किशमिश में है। इसे ग्रहण करने से देह में जल्दी रक्तहीनता नहीं आती। यह एक मुख्य क्षारधर्मी खाद्य है तथा इसके भीतर की क्षार साधारण क्षार खाद्यों से बहुत अधिक है। काफ़ी मात्रा में ग्रहण करने से देह में क्षार का सञ्चय हो जाता है। क्षार श्रेणी के खाद्य खून तथा देह के तन्तुओं को साफ़ करते हैं। इसलिए खाद्यों में किशमिश का अंश रहने से रोग-प्रतिरोध क्षमता बढ़ती है। विभिन्न रोगों में किशमिश ओषधि के रूप में काम में लायी जाती है। यह एक प्रकार की चिकित्सा-पद्धति है, जिसे अंगरेजी में ‘रेजिन क्योर कहते हैं। किशमिश को दूध के साथ उबालकर भी खाया जा सकता है |

बच्चों को दांत निकलने पर |

बच्चों को दांत निकलने पर बड़ा कष्ट होता है। नित्य दो चम्मच अंगर का रस पिलाने से बिना तकलीफ के दांत निकल आते हैं। इसके पिलाने से बच्चों को सूखा रोग भी नहीं होता है। थोड़ा-सा शहद मिलाकर शिशु को देने पर और लाभदायक होता है। स्त्रियों के लिए भी यह एक अच्छा टॉनिक है। नित्य सौ ग्राम की मात्रा में लेते रहने पर शरीर स्वस्थ व फुर्तीला बना रहता है। साथ ही मासिक धर्म भी ठीक बना रहता है। अंगूर का रस शिशु से लेकर बड़ी-से-बड़ी उम्र के व्यक्ति के लिए भी लाभदायक है। सब नि:संकोच इसका पान कर सकते हैं। अंगूर का रस अमृत के समान गुणकारी माना गया है।

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