Amazing benefits of orange in hindi | संतरे के फायदे और नुकसान | orange juice

Amazing benefits of orange in hindi | संतरे के फायदे और नुकसान | orange juice

Amazing benefits of orange in hindi | संतरे के फायदे और नुकसान | orange juice
संतरे के फायदे और नुकसान

फलों में संतरा भी एक बड़ा उपयोगी फल है

फलों में संतरा भी एक बड़ा उपयोगी फल है, यह भी प्रकृति की एक अद्भुत देन है। यह कहां जन्मा? कई देश इसे अपने यहां का होने का गौरव प्रदान करते हैं। कुछ लोग चीन को संतरे का जन्म स्थल मानते हैं। भूमध्य सागर के तटवर्ती प्रदेशों तथा पश्चिमी देशों, भारत में यह फल प्राचीनकाल से पाया जाता है। दूसरी सदी में मिस्र, फिलिस्तीन और लेबनान-जैसे देशों में बड़े परिमाण में संतरा पैदा होने लगा। वहां इस फल के बड़े-बड़े बाग लगे होते थे। इसी समय दक्षिणी देशों में भी संतरा पैदा होने लगा। कहा जाता है कि स्पेन में सातवीं सदी में संतरा पहुंचा। यह स्पेन से ही कोलम्बस द्वारा नयी दुनिया में सन् 1433 में ले जाया गया। सत्रहवीं शताब्दी में संतरे का बीज सबसे पहले फ्लोरिडा में पहुंचा था। इसके बाद तो दक्षिण अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका और आस्ट्रेलिया में संतरे के बाग के बाग लगाये जाने लगे।
भारत में भूमध्य सागर के तटवर्ती प्रदेशों तथा पश्चिमी देशों में यह प्राचीनकाल से पाया जाता है। । केला, सेब, आम, पपीता, टमाटर आदि अनेक फलों को कच्चा हरा तोड़कर आधुनिक वैज्ञानिक रीतियों से कृत्रिम रूप से पकाया जाता है। कच्चे ही रूप में दूर-दूर तक बाहर भेजकर इससे लाभ कमाया जाता है। बड़ी-बड़ी मात्रा में ये फल विदेशों में निर्यात किये जाते हैं, किन्तु संतरा ही एक फल है, जो पूरी तरह से वृक्ष पर ही पकता है। रासायनिक उपायों से पकाये जाने वाले फलों में वह स्वाभाविक गुण नहीं रह जाता, जो कि प्राकृतिक रूप से पकने वाले फलों में पाया जाता है। प्रकृति स्वयं अपने आप अदभूत गुणों से युक्त फल पैदा करती है और पकाकर उन्हें परिपक्वावस्था प्रदान करती है। संतरा वृक्ष पर ही पकता है और पक जाने पर ही तोड़ा जाता है। अतः इसके प्राकृतिक गुण नष्ट नहीं होते हैं। कच्चा-हरा तोड़कर इसको पकाने की कोई विधि नहीं है। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। दूध में भी इतनी पौष्टिक शक्ति नहीं होती है, जितनी उसी के बराबर संतरे के रस में पायी जाती है। दूध देर से पचता है, जबकि संतरे का रस बहुत जल्दी खून में मिल जाता है। 

जो लोग एक जगह बैठकर काम करते हैं

जो लोग एक जगह बैठकर काम करते हैं, कम चलते-फिरते हैं, उन्हें संतरे का प्रयोग करना चाहिए, क्योंकि इससे पेट में किसी प्रकार का भारीपन नहीं होगा। अपच, मन्दाग्नि, गैस, भारीपन आदि को दूर करने में यह अचूक है।। यदि रात्रि में सोने से पूर्व और प्रात: उठते ही एक-दो ले लिये जायें, तो यह पेट की सफ़ाई के लिए बहुत ही उपयोगी होता है। चरक, सुश्रुत और भाव-प्रकाश आदि प्राचीन ग्रन्थों के मतानुसार संतरा खट्टा और मीठा दोनों ही प्रकार का उपयोगी होता है। यह भोजन में रुचि उत्पन्न करने वाला, विकारों को नष्ट करने वाला है। अधिक मात्रा में खाने पर कफ और पित्त बढ़ाने वाला, हृदय की शक्ति बढ़ाने वाला और कमजोर शरीरों को बल देने वाला होता है। इसके प्रयोग से निर्बल शरीर में स्फूर्ति का सञ्चार होता है।
संतरे का रस ज्वर के रोगी के लिए अत्यन्त लाभकारी है। यह रोगी की शक्ति को संतुलित रख मल-मूत्र निवारक है, जिससे न तो ज्वर में उपद्रव उत्पन्न होते हैं और न दुर्बलता का अनुभव होता है। इसके पीने से बार-बार लगने वाली प्यास भी शान्त हो जाती है। जिन व्यक्तियों को गरमियों में नकसीर फूटती है अथवा मुख, मल द्वारा रक्त बहता है, उन्हें संतरे का रस ठण्डक पहुंचाकर इस रोग में लाभ देता है। इसका रस बड़ा स्वादिष्ट और सुपाच्य होता है। इसकी खुशबू भी मनभावन होती है। भारत में जिन फलों का रासायनिक महत्त्व है, उसमें संतरा अपना विशेष स्थान रखता है। संतरा भिन्न-भिन्न नामों से लोकप्रिय है।

फ्लू होने पर।

फ्लू होने पर केवल संतरे का रस सेवन करने से शान्ति आती है। मलेरिया होने पर दो कप पानी में इसके छिलके उबालें। बाद में यह पानी पीने से मलेरिया शान्त होता है। श्वास रोग, टी.बी., हृदय के दर्द में संतरे का रस लाभदायक है। संतरे की खेती विशेष रूप से मध्यप्रदेश में नागपुर तथा राजस्थान में भवानी मण्डी, जिला झालावाड़ में विशेष रूप से होती है तथा यहां का संतरा समस्त भारत में विख्यात है। सिलहट (आसाम) तथा यू.पी. के पहाड़ी स्थानों (बागेश्वर) में भी होता है। प्रत्येक स्थान की भौगोलिक भिन्नता, खाद, जलवायु आदि की रद्दोबदल के कारण स्वाद में भिन्नता आ जाती है।
नागपुरी संतरा मध्यप्रान्त में उत्पन्न होता है। सिलहट का संतरा अथवा खसिया का संतरा आसाम प्रदेश में पाया जाता है। देशी संतरा पंजाब, देहली प्रान्त तथा उत्तर प्रदेश के पश्चिमी भागों में उत्पन्न होता है, जिसमें फुलाव तो है, किन्तु अन्दर से खाद्यांश बहुत कम निकलता है। स्वाद में यह कुछ अम्लता लिये हुए होता है। पूना के समीप पाया जाने वाला संतरा तथा कुर्ग मंसूर और नीलगिरी की पहाड़ियों में पाया जाने वाला संतरा प्रसिद्ध है। इन सब किस्मों में नागपुरी और सिलहट के संतरे को ही विशिष्ट माना गया है। झालावाड़ के भवानी मण्डी में पाया जाने वाला संतरा भी समूचे राजस्थान में अत्यन्त लोकप्रिय है। सभी लोग बड़े चाव से संतरे का सेवन करते हैं। इसकी फांकों का रस चूसते हैं और गूदा खा जाते हैं। फांकों में होने वाले बीज थूक दिये जाते हैं। यह बीज तिक्त होते हैं।
संतरा प्रकृति की सर्वाधिक उपयोगी देन है। इसका रस सुपाच्य है। इसे पचा हुआ भोजन कहा गया है, जो बच्चों तथा मरीजों को नि:संकोच दिया जा सकता है। यह नयी शक्ति और स्फूर्ति प्रदान करता है। इसका गूदा और रस बहुत जल्दी पच जाता है। यही कारण है कि थके-हारे, निर्बल, बीमार व्यक्तियों के लिए यह इतनी ताजगी और स्फूर्ति देने वाला है। यह जितना मीठा होता है, उतना ही पौष्टिक और भोजन की दृष्टि से शक्तिशाली माना गया है। एक गिलास संतरे का रस सारी भूख को मिटा देने की शक्ति रखता है। शिशु से लेकर 60-80 वर्ष तक का बूढ़ा इसे सरलता से हजम कर सकता है। संतरे का रस पेट में जाकर किसी प्रकार की खराबीं उत्पन्न नहीं करता है।

संतरे का रस ज्वरयुक्त रोगी के लिए अत्यन्त लाभकारी है।

संतरे का रस ज्वरयुक्त रोगी के लिए अत्यन्त लाभकारी है। यह रोगी की शक्ति को सन्तुलित रखते हुए मलमूत्र निस्सारक है, जिससे न तो ज्वर में अन्य उपद्रव उत्पन्न होते हैं और न दुर्बलता अनुभव होती है। इसे पीने से बारम्बार लगने वाली प्यास शान्त हो जाती है। जिन व्यक्तियों को गरमियों में नकसीर फूट पड़ती हो अथवा मुख द्वारा, मल द्वारा, मूत्र द्वारा रक्तस्राव होता हो, उन्हें संतरे का रस लाभ पहुंचाता है। इसका रस निकालकर उसमें थोड़ा नमक और काली मिर्च मिलाकर पीना चाहिए। नमक और काली मिर्च मिला देने से यह सुस्वादु होने के साथ-साथ शीघ्र पच भी जाता
। स्वस्थ अवस्था में झिल्ली समेत ही इसकी फांकों को खाना लाभदायक है। इस प्रकार सेवन करने से क़ब्ज़ नहीं हो पाता। यदि दैनिक भोजन के साथ-साथ दो-तीन संतरे प्रतिदिन खा लिये जायें, तो शरीर में कार्य करने की क्षमता बढ़ जाती है। काम करते हुए आलस्य पास नहीं आता है। उपवास के दिनों में संतरे के रस से काफ़ी सहारा मिलता है। यह क्षय हुई शक्ति प्रदान करता है। जो स्त्रियां या बच्चे दुर्बल हों, उन्हें भी शक्ति सञ्चय के लिए संतरे के रस का प्रयोग करना चाहिए।
वनौषधि चन्द्रोदय' नामक ग्रन्थ में प्रत्येक फल के रस की उपयोगिता का वर्णन है। संतरे के सम्बन्ध में लिखा है-'संतरे के फल में विटामिन 'ए' और 'बी' साधारण मात्रा में तथा विटामिन 'सी' प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। दस ग्राम संतरे के रस में विटामिन 'सी' 68 मिलीग्राम की मात्रा में पाया जाता है। अतः जिन लोगों की हड्डियां और दांत कमजोर हों, पायरिया को शिकायत हो, ब्लड प्रेशर हो, लकवा या गठिया की शिकायत हो, यदि गर्भवती स्त्री को उलटी हो रही हो, उन्हें संतरे के रस का निरन्तर और नियमित रूप से सेवन करना चाहिए। इन तीनों विटामिनों के अतिरिक्त लोहे की मात्रा भी अच्छी पायी जाती है। 

इसका सेवन करने से खून में वृद्धि भी होती है।

इसका सेवन करने से खून में वृद्धि भी होती है। सामान्य दुर्बलता दूर करने के लिए संतरे का रस, चीनी, दालचीनी, नागकेसर, छोटी इलायची, प्रियंगु, काली मिर्च, पीपल, बायडिंग को एक चीनी के बर्तन में डालकर 21 दिन पड़ा रहने दें। फिर छानकर बोतलों में भर लें। दस ग्राम की मात्रा में बराबर का जल मिलाकर भोजन के बाद दोनों समय पीने से शरीर की दुर्बलता दूर हो जाती है। । बीमारी और बुखार की हालत में, जब कोई खाद्य-पदार्थ ग्रहण नहीं किया जा सकता है, तब संतरे का रस आश्चर्यजनक रूप से ताजगी लाता है।
और ताकत बनाये रखता है। यह बिना किसी खतरे के रोगी या कमजोर व्यक्ति को दिया जा सकता है। डॉक्टर भी इसका महत्त्व स्वीकार करते हैं। संतरे का रस निकालकर उसमें थोड़ा नमक और काली मिर्च मिला देने से यह सुस्वादु होने के साथ-साथ शीघ्र पचने वाला हो जाता है। स्वस्थ अवस्था में झिल्ली समेत ही इसकी फांकों को खाना लाभदायक होता है। पेट में संचित मल पदार्थों, कब्जियत आदि को दूर करने के लिए संतरे का प्रयोग सबसे बढ़िया ओषधि है। उपवास के दिन पेट के लिए बड़े नाजुक होते हैं और किसी भी गरिष्ठ पदार्थ से हानि होने की आशंका रहती है। उपवास काल में संतरे के रस से उपवासकर्ता को काफ़ी सहारा रहता है। बड़े-बड़े प्राकृतिक चिकित्सकों ने संतरे के रस को लेकर ही उपवास तोड़ा है। संतरे का रस खाली पेट में कोई उपद्रव नहीं करता है। अत: उत्तम स्वास्थ्य को लाने और पाचन क्रिया को नये सिरे से सक्रिय बनाने के लिए संतरे के रस का अधिकाधिक प्रयोग करना उचित है।
आयुर्वेद में संतरे के गुणों पर विस्तार से विचार किया है। इसे न केवल स्वास्थ्य के लिए प्रत्युत रोगों को दूर करने में भी उपयोगी पाया है। मीठे अथवा खट्-मिट्ठे संतरे का रस गुणकारी है। यह शीतल, बलवर्द्धक, अम्ल व मधुर, भूचल, विपघ्न, रुचिकारक, सुस्वादु और भूख लगाने वाला होता है। प्यास, ज्वर, वमन, पित्त, अतिसार, कृमि, पाण्डु इत्यादि अनेक रोगों को दूर करने वाला होता है। 

यह शरीर में ताजगी लाता है।

यह शरीर में ताजगी लाता है। रक्त में निखार आ जाता है। रक्त की सफ़ाई होने पर खूबसूरती बढ़ जाती है। जिनकी त्वचा काली, खुरदरी व खुश्क है, उनमें रक्त विकार समझना चाहिए। रक्त की शुद्धि होने से त्वचा में सुर्खा आती है। कान्ति बढ़ती है, आंत में रुका हुआ भोजन भी शीघ्र पचकर मल विकार दूर हो जाते हैं। क्षुधा बढ़ जाती है। इसीलिए जो नियमित रूप से ताजा संतरा इस्तेमाल करते हैं, उन्हें अपने अन्दर आश्चर्यजनक रूप से ताजगी अनुभव होती है। उनका सौन्दर्य बढ़ जाता है।
संतरा हृदय रोगों, वात विकारों तथा उदर के दोषों को दूर करने में विशेष रूप से लाभदायक होता है। क्षय आदि छाती के विकारों के लिए लाभकारी है। पेट के रोगियों को सर्वप्रथम इस फल का प्रयोग कर उसके बाद अन्य खाद्य-पदार्थ लेना लाभकर होता है। संतरे के गूदे की ऊपर की सफ़ेद झिल्ली जल्दी नहीं पचती। इसलिए संतरा खाने से पहले उसे निकाल फेंकना चाहिए। भोजन कर लेने के बाद संतरे का सेवन करना स्वास्थ्यवर्द्धक है। इसके रस में विटामिन 'ए' और विटामिन 'बी' साधारण मात्रा में तथा विटामिन 'सी' विशेष परिमाण में पाया जाता है। अत: इसका सेवन शरीर की प्रतिकारात्मक शक्ति को बढ़ाता है। बाह्य दूषित जीवाणुओं की विकारात्मक शक्ति का प्रतिकार करने में सहायक है।
इसके सेवन से संक्रामक रोग सहसा नहीं हो पाते। संतरे के रस में शर्करा, लुआब, साइट्रिक एसिड, साइट्रिक ऑफ़ पोटश 23% होता है। ताजे फल के छिलके में व पुष्प में एक प्रकार का हलका पीला सुगन्धित, कड़वा एवं उड़नशील तेल होता है, जिसे 'निरोली' कहते हैं। फल के छिलके में एक प्रकार का और स्थायी तेल पाया जाता है, जिसमें सपन, लाइमोनिन, हेस्पीरिडीन तथा औरेशिया मेरिन नामक तत्त्व घुले रहते हैं। इनके अतिरिक्त टेनिन व क्षार 4.5 प्रतिशत होते हैं। 

पेट के रोगों में संतरे को विशेष उपयोगी पाया गया है।

क़ब्ज़, इन्फ्लुएंजा, हिस्टीरिया, ज्वर तथा पेट के रोगों में संतरे को विशेष उपयोगी पाया गया है। वृक्ष-विज्ञान' पुस्तक में संतरे द्वारा कल्प करने का तरीका इस प्रकार दिया है-प्रथम दिन केवल 250 ग्राम संतरे का रस, एक ग्राम सेंधा नमक मिलाकर दोपहर को पिलायें। । दूसरे दिन 375 ग्राम और तीसरे दिन 500 ग्राम मात्र। इस तरह रोज 125 ग्राम संतरे का रस बढ़ाते हुए तीस दिन सेवन करें। नमक केवल एक ग्राम की मात्रा ही प्रतिदिन बढ़ायें। केवल अरुचि को मिटाने के लिए रस के स्वाद को बढ़ाने के लिए ही मिलायें, अन्यथा नहीं।
कल्प के दिनों में अन्न आदि लेना बन्द रखें। एक मास के बाद कल्प की समाप्ति के आगे भी संतरे का रस लेना जारी रखना ठीक होता है। फिर भोजनारम्भ के दिन सर्वप्रथम मूंग की दाल का पानी लें। उसके बाद धीरे-धीरे साधारण भोजन पर आ जायें। इस कल्प को विधिवत् कर वृक्क शोथ के अतिरिक्त मंदाग्नि, उदरशूल तथा पूरे शरीर का शोथ भी मिटता है। 

गरमी के मौसम में।

गरमी के मौसम में चारों ओर गरमी बढ़ जाती है और शरीर में खुश्की होती है, तो संतरे के रस का उपयोग करना स्वास्थ्य-शक्ति और शीतलता प्रदान करने वाला है। | 100 ग्राम संतरे के रस में 250 ग्राम खांड मिलाकर पकायें। जब शरबत की चाशनी हो जाये, तब आंच पर से उतारकर ठण्डा कर शीशियों में भर लें। आधा कप की मात्रा में जल मिलाकर सेवन करें। इस शरबत से गरमी की व्याकुलता नष्ट हो जाती है।
| जलोदर को दूर करने के लिए भी संतरे का उपयोग लाभदायक बताया गया है। जलोदर दूर करने के लिए संतरे की शिकंजवी बनाकर रख लेनी चाहिए। संतरे के रस में कासनी की जड़, छाल तथा ककड़ी के बीज व खीरा के बीज का चूर्ण मिला लें और रात-भर भीगा पड़ा रहने दें। प्रात:काल उसे धीमी आंच पर चढ़ाकर पकायें। जब पक जाये, तो छानकर सिरका मिलाकर पुनः पकायें। दस ग्राम की मात्रा में रोगी को दें। यह जलोदर के अतिरिक्त तेज ज्वर को भी कम करता है और खुश्की दूर करता है।
संतरे के छिलके का रस आंखों में पड़ जाने पर बहुत जोर से जलन पैदा । करता है, पर बाद में बड़ा ठण्डापन देता है। संतरे का छिलका भी उपयोगी है। इसे सुखाकर इसका चूर्ण बनाकर चेहरे पर लेप करने से कील, प्रशंमी, चेचक के दाग मिटते हैं, चेहरा कोमल और सुन्दर होता है तथा निखार आता है। यह सौन्दर्यवर्धन में सहायक है।
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